Saturday, June 22, 2013

कविता - 22 : आत्मारंजन की कविता "पृथ्वी पर लेटना"

 ख़ालिस संवेदनाओं के कवि आत्मारंजन की कविताओं में अपने समयकाल की निष्कपट छवियां हैं । "पगडंडियां गवाह हैं", आत्मारंजन का हाल ही में प्रकाशित पहला कविता-संग्रह है । संग्रह की कविताएं अपने सरोकारों के चलते किसी भी सहृदय पाठक के मन-मस्तिष्क पर अपना प्रभाव बनाने में सक्षम हैं । सचमुच, यह ठहर कर सोचने का समय है कि आज कविता के सरोकार क्या हैं और इन कविताओं के साथ क्या हैं हमारे सरोकार । बड़ी मासूमियत के साथ कवि कहता है - सुख का क्या है, वह तो मिल जाता है एक छोटे से स्पर्श में भी । यह स्पर्श है मिट्टी का स्पर्श ! कवि सचेत करता है कि मिट्टी में मिलाना और धूल चटाना जैसी उक्तियां विजेताओं के दम्भ से निकली हैं । असल में तो धूल चाटने वाला ही जान पाता है मिट्टी की महक को और धरती के स्वाद को । इतना ही नहीं, कवि की चिन्ता यह भी है कि धरती और मिट्टी के सन्दर्भ में जीतना और जोतना पर्यायवाची हैं और यहां जीतने की शर्त रौंदना नहीं बल्कि रोपना है ।


संग्रह की कविताओं में "पृथ्वी पर लेटना" कविता खास तौर पर समकालीन सन्दर्भों में उल्लेखनीय है । इसके स्पष्ट कारण हैं । सबसे पहले तो यह कविता श्रम और उससे उपजी थकान को सम्पूर्ण अर्थवत्ता के साथ न सिर्फ़ उकेरती है बल्कि उसके सौन्दर्य को भी रेखांकित करती है । आत्मारंजन इसी कविता में एक बहुत मारक बात कह जाते हैं: "कि तमाम ख़ालिस चीज़ों के बीच / सुविधा एक बाधा है" । यह एक छोटी सी काव्य-पंक्ति अपनी अनुगूंजों के लिए अर्थवान है ।

बात कविता की करें तो उसमें थक कर चूर होती हुई एक मानुष-देह का विश्राम है । विश्राम, आज की सभ्यता का नाभिकीय शब्द । यहां श्रम कोई और कर रहा है और विश्राम कोई और ले रहा है । लेकिन श्रम के बिना विश्राम ऐय्याशी में बदल जाता है, वह विलास बन जाता है । भूख के बिना रोटी का स्वाद और प्यास के बिना पानी की तरावट को समझना एक बौद्धिक व्यायाम भर है । उसी तरह श्रम के बिना आराम या विश्राम को समझना एक मानसिक कवायद भर है । आत्मारंजन के सरोकार भी यही हैं । सुविधा एक बाधा है क्योंकि वह व्यक्ति को समझौतों की संकरी गली तक खींच कर ले जाती है । जो भारी थकान से शिथिल होकर धरती पर पीठ के बल लेटा है वह कविता की भाषा में "पृथ्वी से सीधा संवाद कर रहा" है ।

कहना न होगा कि यह कविता एक ऐसे समय और समाज की खोज की यात्रा पर निकलती है जहां प्रकृति और मनुष्य का सह-अस्तित्व अपनी उन्मुक्तता में सम्भव बनता है ।
 

पृथ्वी पर लेटना (कविता):


पृथ्वी पर लेटना

पृथ्वी को भेंटना भी है

ठीक वैसे जैसे

थकी हुई हो देह

पीड़ा से पस्त हो रीढ़ की हड्डी

सुस्ताने की राहत में


गैंती-बेलचे के आसपास ही कहीं

उन्हीं की तरह

निढाल हो लेट जाना

धरती पर पीठ के बल

पूरी मौज में डूबना हो

तो पृथ्वी का ही कोई हिस्सा

बना लेना तकिया

जैसे पत्थर

मुंदी आंखों पर और माथे पर

तीखी धूप के खिलाफ़

धर लेना बांहें

समेट लेना सारी चेतना

सिकुड़ी टांग के खड़े त्रिभुज पर

ठाठ से टिकी दूसरी टांग

आदिम अनाम लय में हिलता

धूल धूसरित पैर

नहीं समझ सकता कोई योगाचार्य

राहत सुकून के इस आसन को

मत छेड़ो उसे ऐसे में

धरती के लाड़ले बेटे का

मां से सीधा संवाद है यह

मां पृथ्वी दुलरा-बतिया रही है


सेंकती सहलाती उसकी

पिराती पीठ

बिछावन दुभाषिया है यहां

मत बात करो

आलीशान गद्दों वाली चारपाई की

देह और धरती के बीच

अड़ी रहती है वह दूरियां ताने

वंचित होता/चूक जाता

स्नेहिल स्पर्श

ख़ालिस दुलार

कि तमाम ख़ालिस चीज़ों के बीच

सुविधा एक बाधा है

पृथ्वी पर लेटना

पृथ्वी को भेंटना भी है

खास कर इस तरह

ज़िन्दा देह के साथ

ज़िन्दा पृथ्वी पर लेटना ।

 

 

 

 

Thursday, April 18, 2013

कविता- 21: अग्निशेखर की कविता "धूल"


"धूल में मिला देना" हिन्दी में एक मुहावरा है । यह धूल नश्वरता का रूप है तो सृजन का भी है । धूल दिखती नहीं तब भी वह होती है । वह हवा में तैरती है और चीज़ों पर अपनी छाप छोड़ती है । कवि अग्निशेखर जब धूल को देखते हैं तो वह मामूली सी धूल “समय” में बदल जाती है । इस धूल का वितान बहुत बड़ा हो जाता है । "धूल" कविता में अग्निशेखर एक दार्शनिक की तरह धूल से साक्षात्कार करते हैं ।

 

 कवि अग्निशेखर हिन्दी के उन विरलतम कवियों की प्रजाति से हैं जो सम्मान में गुलदस्ता लेने के लिए सरकार के आगे झुकना स्वीकार नहीं करते । उन्हें पढ़ते हुए ज़ेहन में दस्तक देती हुई एक ख़बर दाख़िल होती है कि इस कवि ने "इक्यावन हज़ार रुपए का सम्मान" ठुकरा दिया था । चालाक समय में यह "बदतमीज़ी" कितने कवि कर सकते हैं । "धूल सने कांच" पर यह यह कवि की "उधेड़बुन" है :

"यह कैसे समय में रह रहे हैं हम / कि धूल सने काँच पर / हमारे संवेदनशील स्पर्श / हमारी उधेड़बुन / हमारे रेखांकन / हमारी बदतमीजियों के अक्स / कहे जाते हैं" ।


धूल जैसी साधारण दिखने वाली चीज़ कवि के यहां इतनी शातिर है कि ज़िन्दगी के कोनों-अंतरों तक पीछा करती है । वह "सपनों में खिल आए गुलाब" पर भी गिरती है । उसकी पहुंच की ज़द में वह "अलमारी" भी है जिसे हम "सबके सामने नहीं खोलते" । अग्निशेखर के यहां धूल इतनी ज़िद्दी है कि वह "इन शब्दों में" कविता लिख रहे कवि की ओर "कहीं पास से" देख रही है और कवि के "कहीं चले जाने पर" इरादतन लिखने की मेज़ पर "उतर आएगी" । कविता में धूल एक रहस्य से भरे बिम्ब के रूप में प्रकट होती है ।

 

कविता में ज़िन्दगी एक "धुली हुई सुबह" की तरह खुलती है हमारे बीच । कहना न होगा कि इस ज़िन्दगी में  प्रकृति की आदिम पवित्रता  की महक है । यह ज़िन्दगी हमारे बीच ऐसे खुलती है "जैसे कि एक पत्र हो" जो अभी-अभी एक बन्द लिफ़ाफ़े से निकला है और जिसे अभी पढ़ा जाना है । जैसे ही हम किसी "बे-पढ़े वाक्य" को छूना चाहते हैं, वह धूल "हमारी अंगुली से चिपक जाती है" । यह बात कवि को हैरत में डालती है कि यह धूल आख़िर आती कहां से है :

"जब हमें दिखाई नहीं देती /  पता नहीं कहाँ रहती है उस समय" ।

 

कवि धूल के इस तिलिस्म को तोड़ना चाहता है । कविता में ही एक जगह वह कहता है : "यों देखा जाए तो /  जिसे हम काली रात कहते हैं / वह सूरज की आँख में / धूल का झोंका है" । कहने की आवश्यकता नहीं कि "आंखों में धूल झोंकना" भी हिन्दी में एक मुहावरा है । इस तिलिस्मी समय में जो सर्वशक्तिमान है वह हमारी आंखों में धूल झोंकने वाला है, वह हमें धूल में मिला देने के लिए निरन्तर साजिशें करता है । उसकी ख़तरनाक पहुंच से हमारे जीवन का अन्तरंग भी अब नहीं बचा । ऐसे समय में अग्निशेखर की यह कविता उम्मीद(सूरज) के चेहरे से धूल पोंछने का काम करती है ।

 

 

धूल / अग्निशेखर

जब हमें दिखाई नहीं देती
पता नहीं कहाँ रहती है उस समय
और जब हम एक धुली हुई सुबह को
जो खुलती है हमारे बीच
जैसेकि एक पत्र हो
उसके किसी बे-पढ़े वाक्य को छूने पर
हमारी उँगली से चिपक जाती है

यह कैसे समय में रह रहे हैं हम
कि धूल सने काँच पर
हमारे संवेदनशील स्पर्श
हमारी उधेड़बुन
हमारे रेखांकन
हमारी बदतमीजियों के अक्स
कहे जाते हैं

यह समय क्या धूल ही है
जिससे कितना भी बचा जाए
पड़ी हुई मिलती है
उस अलमारी में भी
जिसे हम सबके सामने नहीं खोलते
मैंने सपने में खिल आये गुलाब पर भी
इसे देखा है
यों देखा जाए तो
जिसे हम काली रात कहते हैं
वह सूरज की आँख में
धूल का झोंका है

इन शब्दों में
जबकि मै लिख रहा हूँ कविता
वह झाँक रही होगी कहीं पास से
और मेरे कहीं चले जाने पर
उतर आएगी मेज़ पर.

 

 

Saturday, December 1, 2012

कविता -20 : अशोक सिंह की कविता "मां की रसोई"



"वक़्त के चूल्हे पर चढ़ी है

जीवन की हांड़ी

खौल रहा है उसमें

आंसू का अदहन

अभी-अभी मां डालेगी

सूप भर दुख

और झोंकती अपनी उम्र

डबकाएगी घर-भर की भूख !"


हिन्दी में मां पर लिखी कविताओं की यूं तो कमी नहीं । लगभग एक मिथक की तरह मां के बिम्ब कविताओं में देखे जा सकते हैं । इन कविताओं का स्थायी भाव यह कि मां त्याग का ही पर्याय बन जाती है । कविता की दुनिया में मांएं जिस तरह से याद की जाती हैं उसमें भावुकता ज़्यादा स्थान घेरती है । मुझे कई बार ऐसा लगता है कि कविता में हम जिनका महिमा-मण्डन कर रहे होते हैं , इनके प्रति कहीं न कहीं एक अपराध-बोध हमारे भीतर काम कर रहा होता है । मुझे इस वक़्त ऐसी कोई कविता किसी महत्वपूर्ण कवि के नाम के साथ नहीं याद आ रही है जिसमें मां एक स्त्री और एक मनुष्य की तमाम दुर्बलताओं के साथ दिखाई देती हो । ऐसा शायद इसलिए होता होगा कि एक सर्वमान्य छवि या इमेज मां के बारे में हमारे मनोजगत में गहरे अंकित हुआ करती है । शास्त्र भी कहते हैं कि मां के ऋण से मुक्त नहीं हुआ जा सकता । वह जन्म देने वाली सत्ता है इसलिए स्तुत्य है , पूजनीय है ।


खैर , यहां सवाल यह है कि मां पर देखी सुनी कविताओं में इस एक छोटी सी कविता में ऐसा क्या है जो उसे बहुत सच और विश्वसनीय बनाता है । मुझे ऐसा लगता है कि चंद पंक्तियों मे एक "जीवन-दर्शन" बड़े ही प्रभावी ढंग से कविता में उपस्थित होता है जो स्त्री के समग्र जीवन का एक हाई-डेफ़िनिशन चित्र खींचता है । इतने कम शब्दों में एक मां और एक स्त्री के समूचे जीवन-व्यापार को कह पाना अशोक सिंह को एक बेहतर कवि साबित करता है । मां से भी बढ़कर यह एक स्त्री की कविता है । उसका जीवन ही एक हांड़ी है जो चूल्हे पर चढ़ी हुई है । वह हर हाल में एक इस्तेमाल की वस्तु में बदल जाती है । और स्पष्ट करूं तो वह एक उपकरण मात्र है । जिस तरह किसान कभी अपने हल और कुदाल का दुख नहीं पूछता , एक रसोइया भी उस हांड़ी का दुख नहीं पूछता और उसकी आपबीती कोई नहीं सुनता । वह आग पर चढ़ती है , तपती है तब घर के लिए अन्न पकते हैं । उसे थकने की इज़ाजत नहीं है । अगले ही जून उसे धो-मांज कर फिर चूल्हे पर चढ़ा दिया जाएगा । अदहन की जगह आंसू , जो कि उसके हिस्से में ही आते हैं । अनाज की जगह दुख जो उसी के हैं । जलावन की जगह अदद उम्र जो उसी की है । उफ़्फ़ ..इतना कारुणिक चित्र !


यह कैसी रसोई है कि जिसमें सूप भर अन्न के बदले सूप भर दुख पकाए जा रहे हैं । यह कौन सा चूल्हा है जिसमें काठ और कोयले की जगह मां की उम्र झोंकी जा रही है । यह मां की कैसी रसोई है जहां अदहन में पानी की जगह आंसू उबल रहे हैं । वक़्त के चूल्हे पर जीवन की हांड़ी चढ़ाने वाला यह कवि हिन्दी कविता में अभिव्यक्ति का एक ईमानदार हस्ताक्षर है । कहते हैं , ढाई आखर प्रेम के । एक सुन्दर कविता भी सिर्फ़ चार पंक्तियों मे संभव है ।


Saturday, October 6, 2012

कविता - 19 : कात्यायनी की कविता - "इस स्त्री से डरो"


हिन्दी की समकालीन स्त्री कवियों में कात्यायनी जैसी विश्वसनीयता बहुत कम कवियों ने अर्जित की है । अपने पोलिटिकल ओवरटोन के बावजूद कात्यायनी की बातें पाठक को विश्वास में लेकर चलती हैं तो इसलिए कि इनकें यहां कविता का मतलब भाषिक बाजीगरी से कहीं अलग एक कवि के चैतन्य की उपलब्धि ही होता है । कात्यायनी कविताएं बनाती नहीं हैं । कात्यायनी की कविताओं में यत्र-तत्र नारेबाजी भी है । यह वैचारिकता का दबाव हो सकता है जो एक दौर में हिन्दी कविता में लगभग मौसमी बुखार की तरह दर्ज़ भी होता है । अस्सी के दशक के कवियों से लेकर नब्बे के दशक तक यह दबाव बना रहता है । कहानियों में तो खैर यह एक अलग दौर ही था । सुन्दर-सुघड़ कविताएं तो कई स्त्री कवियों ने बनाईं । लेकिन कात्यायनी के कवि के भीतर एक चौकन्नी स्त्री है जो मनुष्य पहले है , स्त्री उसके बाद । यह विशिष्टता एक विरल चीज़ है जिसकी वजह से कात्यायनी के आस-पास कोई दूसरा नहीं दिखता । कात्यायनी जैसी अभिव्यक्ति हिन्दी में विरल है । यूं कहने सुनने के लिए नाम तो बहुत हैं ।

"इस स्त्री से डरो" कात्यायनी की एक बेहतरीन कविता है । यह कविता यथार्थ के न सिर्फ़ बहुत निकट की कविता है बल्कि स्त्री के मनोजगत की तहों में प्रवेश के लिए दरवाज़े भी खोलती है । ज़रा सोचिए एक मनुष्य की उस मन:स्थिति के बारे में जब वह दुखी हो और हँस रहा हो , कैद में रहते हुए आज़ादी के गीत गाता हो , बंधन में हो और मुक्ति के सपने देखता हो , यातना सहते हुए भी प्रेम के गीत गा रहा हो । कात्यायनी इस श्लेष की ओर अपने पाठक को ले जाना चाहती है । वे कविता में इसे संभव भी बनाती हैं । कविता में स्त्री सब कुछ जानती है पर सब कुछ कहती नहीं । वह जो कहती है उसे समझने के लिए संवेदना की धार चाहिए । यह उलटबासी गहरे निहितार्थ लिए हुए है । यह निराला की "जो मार खा रोई नहीं" वाली स्त्री के बहुत करीब है । हिन्दी कविता में कात्यायनी इसीलिए एक ज़रूरी नाम है । आज हालत यह है कि जो बहुत कम जानता है वही सबसे ज्यादा बोलता है ।

कवि की आँख से देखिए तो हँसी के भीतर थरथराती काँपती हुई दर्द की लौ दिखती है । प्रेम के अन्त:पुर में दुखों का हहराता सागर दिखाई देता है । मुक्ति के गीत में जंजीरों की खनक साफ़ सुनाई देती है । एक अनिर्वचनीय वेदना कविता की पंक्तियों में तैरती रहती है । इसे ग़ालिब के शब्दों में बयान करें तो , "मुश्किलें इतनी पड़ीं हम पर कि आसाँ हो गईं" की उलटबासी है । यहां सिसकियाँ , हिचकियाँ , और उबासियाँ नहीं हैं , बल्कि एक बड़ी जगह घेरती राग यमन में बजती कोई उदास धुन है ।

 

इस स्त्री से डरो..

(कात्यायनी)

 

यह स्त्री
सब कुछ जानती है
पिंजरे के बारे में
जाल के बारे में
यंत्रणागृहों के बारे में।

उससे पूछो
पिंजरे के बारे में पूछो
वह बताती है
नीले अनन्त विस्तार में
उड़ने के
रोमांच के बारे में।

जाल के बारे में पूछने पर
गहरे समुद्र में
खो जाने के
सपने के बारे में
बातें करने लगती है।

यंत्रणागृहों की बात छिड़ते ही
गाने लगती है
प्यार के बारे में एक गीत।

रहस्यमय हैं इस स्त्री की उलटबासियाँ
इन्हें समझो,
इस स्त्री से डरो।

 

Monday, July 30, 2012

कविता - 18 : अष्टभुजा शुक्ल की कविता "जवान होते बेटों !"


अष्टभुजा शुक्ल भाषा के ठेठ इलाके के कवि हैं । इनकी कविताओं में ठेठ भाषा का ठाट भी खूब दिखता है । जब अरुण कमल जैसा कवि कहता है कि "सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार" तब अष्टभुजा लिखते हैं कि "सारा लोहा अष्टभुजा का अष्टभुजा की धार" । अष्टभुजा शुक्ल की यह बानी एक जनपद के कवि की अक्खड़ बोली है । शुक्ल जी की जवान होते बेटों को संबोधित यह कविता पाठक पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ती है । कविता में बिना लाग-लपेट के बातें करने वाला कवि पिता के रूप में कितना संतुलित है । कितनी गंभीर हैं इस पिता की हिदायतें । और हिदायत भी क्या खूब कि जवान होते बेटों के लिए यह तस्दीक भी है कि इन हिदायतों को न मानना तुम्हारा फ़र्ज़ है जब कि मौसम हिदायतें देने का है । यह महज रस्म-अदायगी नहीं है बल्कि यहां एक ऐसे पिता की चिन्ताएं हैं जो अपने बेटों को सिर्फ़ एक अच्छा आदमी देखना चाहता है (बड़ा आदमी नहीं) ।
कविता में पिता सीधे-सीधे बड़े-बड़े आशीर्वाद नहीं देता । इस पिता के मन में बेटों के लिए गाड़ी , बंगला , बैंक-बैलेंस वाले आशीष नहीं हैं । वह जवान होते बेटों से कहता है कि झुको । इतना झुको कि समतल भी खुद को तुमसे ऊंचा समझे , कि चींटी भी पेट के नीचे से निकल जाए । यह विनम्र होना है , विनयी होना है । आगे कवि कि चेतावनी भी है कि इतना मत झुकना कि कृपा तुम्हारे ऊपर बरसने के लिए हंसती रहे । वह कहता है कि झुकने का कटोरा लेकर मत खड़े होना घाटी में । यह स्वाभिमान है , जीने की एक अदा है ।
पिता कहता है कि इच्छाएं कंचों की गोलियां हैं , अगर फूट जाएं तो अफ़सोस न करना । कोई तुमसे आगे निकल जाए तो भी मुस्कुराना । यह खोने -पाने से ऊपर उठना है , हार-जीत से ऊपर उठना है । जवान होते बेटों से कवि कि अपेक्षा यह भी है कि किसी का भला न कर सको तो कोई बात नही , किसी का बुरा तुम कभी न करना । वह चाहता है कि बेटे परेशानी में पड़े हुए न दिखें बल्कि परेशानी से निकलते हुए दिखें । कोई उनसे प्रेम न भी करे तो वे स्वयं को उसके प्रेम के लायक बनाएं । यह जीवन को साध लेना है ।
चिकनी होती जा रही दुनिया में यह कवि अपने जवान होते बेटों में थोड़ा खुरदुरापन बचा देखना चाहता है । यहां खुरदुरापन को बचाना दरअसल आदमीपन को बचाना है , मानवीय मूल्यों को बचाना है और समझौता-परस्ती के फिसलन भरे रास्ते से निकलना भी है । कवि बेटों में न तो कोई बूढ़ा तज़ुर्बेकार आदमी देखना चाहता है और न ही उनमें शिशु-सुलभ मासूमियत ही देखना चाहता है । वह तो उनमें सिर्फ़ और सिर्फ़ जवानी का मुरीद है । जवानी जिसमें असंभव चीज़ें कर गुज़रने की हिम्मत है ,जिसके पास तोड़ने की ताक़त है तो जोड़ने की तरक़ीब भी है ।
 
 
जवान होते बेटो! / अष्‍टभुजा शुक्‍ल
जवान होते बेटो !
इतना झुकना इतना
कि समतल भी ख़ुद को तुमसे ऊँचा समझे
कि चींटी भी तुम्हारे पेट के नीचे से निकल जाए
लेकिन झुकने का कटोरा लेकर मत खड़े होना घाटी में
कि ऊपर से बरसने के लिए कृपा हँसती रहे

इस उमर में
इच्छाएँ कंचे की गोलियाँ होती हैं
कोई कंचा फूट जाए तो विलाप मत करना
और कोई आगे निकल जाए तो
तालियाँ बजाते हुए चहकना कि फूल झरने लगें

किसी को भीख न देना पाना तो कोई बात नहीं
लेकिन किसी की तुमड़ी मत फोडऩा
किसी परेशानी में पड़े हुए की तरह मत दिखाई देना
किसी परेशानी से निकल कर आते हुए की तरह दिखना
कोई लड़की तुमसे प्रेम करने को तैयार न हो
तो कोई लड़की तुमसे प्रेम कर सके
इसके लायक ख़ुद को तैयार करना

जवान होते बेटो !इस उमर में संभव हो तो
घंटे दो घंटे मोबाइल का स्विच ऑफ रखने का संयम बरतना
और इतनी चिकनी होती जा रही दुनिया में
कुछ ख़ुरदुरे बने रहने की कोशिश करना

जवान होते बेटो !
जवानी में न बूढ़ा बन जाना शोभा देता है
न शिशु बन जाना
यद्यपि बेटो
यह उपदेश देने का ही मौसम है
और तुम्हारा फर्ज है कोई भी उपदेश न मानना